नारी मुक्ती की ओर
नारी मुक्ती की ओर महिला दिन लेख विशेष
डॉ. निर्मला पाटील.
राष्ट्रीय अध्यक्ष, जिजाऊ ब्रिगेड
भारत की आजादी को 75 साल हो गये है. भारत ने कई क्षेत्र में प्रगती की है और दुनिया मे अपना जलवा बिखेरा है. जहां भारत आज दुसरी ग्रह पर जाने का सपना देख रहा है वही भारत में महिलाये पूरी तरह से विकसित होते नजर नही आ रही है.वह इस धार से बाहर है.
वैसे तो राष्ट्रमाता जिजाऊ, अहिल्यामाता,सावित्रीमाई,राणी चन्नमा जैसे कही महिलाओ ने भारत मे अपना गौरवशाली इतिहास रचा है और पूरी दुनिया को महिलाओं के गुणो और क्षमताओं से अवगत कराया है. इसके बावजूद भारतीय समाज में महिलाओं पर शोषण,अन्याय, अत्याचार बढता ही जा रहा है| आज भी समाज मे एक महिला के जन्म को अस्विकार कर दिया जाता है,न ही जन्म का स्वागत खुशी से किया जाता है.
इसका अहम कारण यहा की धार्मिक व्यवस्था और सामाजिक व्यवस्था है.वह आज भी परंपरा के नाम पर धर्म से बंधी हुई है जो उसके पैरो की बेडी बन गई है.आज भी उसे दासी समझा जाता है. पुरुषों के बराबर का दर्जा नही दिया जाता. उसे एक चौखट में कैद करके उसकी क्षमताओं को इसी चौखट की सीमा मे सीमित किया जा रहा है.
स्त्री और पुरुष के बीच इतना भेदभाव क्यों है? प्रकृतीने दोनो को इन्सान के रूप मे बनाया है और उनके बीच कोई भेदभाव नही किया है.लेकिन इस व्यवस्था ने भेदभाव कर के न केवल महिलाओं को बल्की पुरी समाज को भारी नुकसान पहुंचाया है. भारत मे आज भी अपवाद को छोडकर सभी जग पुरुषप्रधान पारिवारिक व्यवस्था के कारण महिलाओंकी स्थिती हीन है. हजारो वर्षों से महिलाओं को मर्दानगी के कारण प्रताडित किया जा रहा है. उन्हे शिक्षा और कमाई के अवसरों से वंचित रखा गया है और इससे उसका आत्मविश्वास और बहादुरी कम हो गई है. कुछ महिलाओं को छोडकर वो अपना अस्तित्व बनाने में पीछे रही है.
नारी सशक्तिकरण
आज 21 वी सदी मे हमे नारीमुक्ती,नारी सशक्तिकरण की बात करनी पड रही है. क्या ये उन्नत समाज का लक्षण है? दरसल ये विषय खत्म हो जाना चाहिये था. आज पुरुषों की तुलना मे महिलाओं की संख्या लगातार कम हो रही है. यह असंतुलन भविष्य मे खतरनाक हो सकता है. इसीलिए हमे इन मुद्दों को गंभीरता से लेकर उचित निर्णय लेना होगा.
इस समाज में पुरुषो और महिलाओं के बीच समानता प्रस्थापित करना अधिक महत्त्वपूर्ण है.महिलाओं को अपनी बात कहने के लिए स्वतंत्र होने की जरूरत है. महिलाओं को पुरुषों से नही बल्की अपनी मानसिक गुलामी से मुक्त होना है. इसके लिए उसे खुद को जानने और समझने की जरूरत है. अपने बारे मे अपराधबोध और भय की भावना को त्यागें और अपनी क्षमतांको पेहचान कर अपनी स्त्रीत्व का सन्मान करें. वह इसलिये गौण नही रही की बुद्धी मे हीन थी.उसे गौण समजकर उपेक्षित किया गया, वो स्वयं को सिद्ध नही कर सकी .
आज यह आरोप लगाया जा रहा है कि,उनके लिये शिक्षा के दरवाजे खोल दिये गये है, पाबंदिया कम कर दी गई है,वह सभी क्षेत्रो मे पुरुषों के बराबर का काम करती है लेकिन वह पुरुषों जितना हसील नही कर पाती है। वह मिले अवसरों का उपयोग करने मे भी असफल हो रही है. भलेही यह सच है. आरोप लगाने वालों को ध्यान देना चाहिये की हालांकी उनके आसपास की दुनिया आधुनिक हो गई है लेकिन महिलाओं के प्रति दृष्टिकोन में जादा बदलाव नही आया है.
खुद को साबित करने के लिए, कुछ करने के लिए उन्हे अभी भी आजादी और अधिकार नही मिले है। इस वजह से उन्हे नही लगता की उनके आगे कोई लक्ष्य है.अपने परिवेश और सांस्कृतिक विचारधारा के कारण वे निष्क्रिय हो जाती है और पिछड जाती है। जीन लडकियों को लडको की तरह पाला जाता है वे स्वतंत्र विचारक बन जाती है, बहादुर और मजबूत बन जाती है. वह अपने अधिकारों को समझती है और अपने लक्ष्य को प्राप्त करती है.
पुरुष और महिलाओं के बीच भेदभाव
लडके और लडकियों के बीच या पुरुष और महिलाओं के बीच भेदभाव का व्यवहार परिवार से या यू कहे की मां से शुरू होता है.लडकियों का संपूर्ण मानसिक गठन महिलाओं की देखरेख में होता है. इस कारण परिवार की प्रत्येक महिला के लिए यह जानना आवश्यक है की पुरुष और महिला के बीच भेदभाव के व्यवहार के दूरगामी परिणाम कितने गंभीर है.
घर के बडे- बुढे हमेशा लडके के मन में यह बात बिठाते है की वो श्रेष्ठ है, कुल का दीपक है और लडकियों के मन मे ये बात बिठाते है कि वो अबला है, पराया धन है.इससे लडकियों के मन मे अधींनता और निर्भरता की भावना पैदा होने लगती है.लडकियों को आज भी यही कहा जाता है कि उसकी जिंदगी मे एक युवक आयेगा और उसे रानी बनाकर ले जायेगा. आज भी लडके और लडकी के काम मे अंतर है.
कुडा साफ करना, बर्तन धोना, खाना बनाना चार दिवारी के अंदर का काम उनका है और चार दिवारी के बाहर का काम लडको का है. यदि वो लोगों के साथ होने वाली घटना और बाहर की दुनिया से नही जोडती,तो वह दुनिया के मामलों को और दुनिया के लोगो को कैसे जानेगी? उसमे साहस और आत्मविश्वास कैसे आयेगा?
लडकी पैदा नहीं होती बल्की बनाई जाती है
परिवार और समाज द्वारा स्त्री में स्त्रीत्व जबरदस्ती पैदा किया जाता है। लडकी पैदा नहीं होती बल्की बनाई जाती है। इसके अलावा समाज मे स्थापित कई परंपराये और अंधविश्वास भी महिलाओं को यह एहसास दिलाते है की वे कमजोर और असहाय है.यही कारण हैं कि महिलाओं पर अत्याचार और बलात्कार की घटनाही लगातार हो रही है और बढती जा रही है. आशंका हैं की समाज में इन घटनाओ के कारण भविष्य मे महिलाओं को शिक्षा, रोजगार और व्यवसाय से वंचित होना पडेगा.
जब तक घर की महिला सकुशल घर नही लौट आती तब तक उनका परिवार बेचैन रहता है. महिला शिक्षा आंदोलन महात्मा ज्योतिबा फुले और क्रांतीज्योती सावित्रीबाई फुले द्वारा सुरू किया था क्योंकि समाज तभी बदल सकता है जब महिलाए शिक्षित होगी. यदि इस स्थिति के कारण महिलाए शिक्षा से वंचित रह गयी, तो वे फिरसे चुल्हे -चौके और बच्चे पालने की चार दिवारी मे कैद हो जायेगी.
महिला का सन्मान
अगर हम इस स्थिति को बदलना चाहते है,तो हमे अपने परिवार से सुरुवात करनी चाहिए. अगर बदलाव की सुरुवात के लिये महिलाए आगे बढेगी तो इसकी गती और बढेगी. हर महिला को अपने सहित सभी का सन्मान करना चाहिए और घर के पुरुषों को भी हर महिला का सन्मान करना सिखाना चाहिए. यदि प्रत्येक व्यक्ती दुसरे के अस्तित्व को भी उतनाही स्वीकार करले जितना अपने अस्तित्व को तो असमानता की भावना कम होने लगेगी. विधवाओ एवं तलाकशुदा महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार न करते हुए सौहार्दपूर्ण व्यवहार किया जाना चाहिए.
अन्य महिलाओं की तरह उनके साथ भी समान व्यवहार किया जाना चाहिए और हर कार्यक्रम में उन्हे शामिल किया जाना चाहिए. यदि लडके और लडकियों के साथ समान व्यवहार किया जाय, समान अवसर, समान काम दिया जाये तो दोनो को यह एहसास होगा की वे इन्सान है.लडके की तरह लडकी को भी ऐसी शिक्षा देनी चाहिये की वो आपना पैसा खूद कमा सके और अपना अस्तित्व बना सके. स्वस्थ सामाजिक व्यवस्था के लिए आवश्यक है.
पुरुषों के समान सभी अवसर और अधिकार महिलाओं को मिले
यदि हम समाज में स्त्री- पुरुष के बीच समानता स्थापित करना चाहते है तो हमे उस तरह से कानून बनाना होगा. महिलाओं को अपनी घरेलू जिम्मेदारीया कम करनी होंगी और उत्पादन प्रक्रिया मे अपनी भागीदारी बढानी होगी. उसके सर्वांगीण विकास के लिए उसे पुरुषों के समान सभी अवसर और अधिकार मिलने चाहिये.
एक महिला को अपनी वास्तविकता का एहसास करने के लिए उसे पहले ये महसूस करना होगा की वो एक स्वतंत्र व्यक्ती है. जब तक महिला सामाजिक रूप से वो एक महिला है भूल नही जाती है तब तक वो एक पुरुष के समान उत्कृष्ट प्रदर्शन नही कर सकती.परिवार,समाज की गाडी को सही ढंग से चलाने के लिए सबसे जादा मेहनत, परेशानी और समझोते उस परिवार की विवाहित महिला करती है। लेकिन वही अपने अधिकारों से वंचित रहती है.
पुरुषो और महिलाओं के बीच समानता अर्थ
स्त्री और पुरुष दोनोही इस प्रकृती के महत्त्वपूर्ण तत्त्व है. दोनो ही मनुष्य है. कुदरत ने दोनों को एक जेसा दर्द, एहसास और संवेदना दि है. दोनों को एक दुसरे के लिए प्रेरक और पूरक होना चाहिये. महिलाए पुरुषों से मुक्ती नहीं चाहती बल्की वे अपने शोषण, गुलामी से मुक्ती चाहती है. इसके लिए पुरुषों को उनकी मदत करनी चाहिए. पुरुषो और महिलाओं के बीच समानता की स्थापना का अर्थ है, समाज में वैज्ञानिक, तर्कसंगत, समतावादी, मानवतावादी सामाजिक संरचना का निर्माण.
आंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाते समय पुरुषो और महिलाओं को यह प्रतिज्ञा करनी चाहिये की, मै समाज मे पुरुष और महिला के बीच समानता स्थापित करने का प्रयास करूँगा या करुंगी.वो दिन सभी को अंधकार से प्रकाश की और ले जायेगा. सदिच्छा के साथ जय जिजाऊ.
— डॉ. निर्मला पाटील.
राष्ट्रीय अध्यक्ष, जिजाऊ ब्रिगेड.
महिला दिवस स्त्री शक्तीचा जागर
जिजाऊ ब्रिगेड भारत में कार्य करने वाली महिल संघटना




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